Monday, March 9, 2015

कुचक्र तोड़ रही हूँ हर रोज

कुचक्र तोड़ रही हूँ हर रोज
समाज तुझमे मर रही हूँ हर रोज.
नारी हूँ , पथगामिनी हूँ
जीवन तेरी ही अर्धांगिनी हूँ
फिर भी कागज़ों में सिमट रही हूँ हर रोज.
हर मुख पर सिसक रही हूँ हर रोज
धारित्री हूँ , वरदायिनी हूँ
माँ तेरी ममतामयी कहानी हूँ
फिर भी हर आस में जी रही हूँ हर रोज
प्रेम तेरे दामन में नफरत सह रही हूँ हर रोज
                                                                ...वी. माया

Monday, March 3, 2014


एक दिन मैं मेरे अपनों से ही परायी हो जाउंगी.
परायी होकर फिर किसी से अपनाई जाउंगी.
ये ज़िन्दगी का खेल तो यूँ ही चलता रहेगा.
किसी का घर छोड़ तो किसी का जोड़ जाउंगी.
ये दौर यूँ ही गुजरता चला जायेगा .
और एक दिन इस ज़िन्दगी से भी नाता तोड़ जाउंगी.
फिर समय का पहिया घूमेगा
मैं वापस इस धरती पर कदम रखने आउंगी.
जिन्दा दिलों से यही है विनय.
मुझे आने देना ख़ुशी के साथ इस धरती पर.
मैं एक नया जीवन चक्र आपके लिए निभाउंगी.
                                                                            ...v.maya

Tuesday, May 22, 2012

मैं और मेरी खूबसूरती

ये उदासी, ये अंधेरा, ये कैद भरी जिंदगी लेकर कहां जाऊं।

मनसा यही जहां जाऊं इसे छोड़ आऊं।।

आज कुछ सोचते-सोचते कितनी उदास हो गई मैं, ये कैद भरी जिंदगी कब अपनी आखिरी सांस लेगी, इसी इंतजार में मेरी खूबसूरती दिन-ब-दिन ढलती जा रही है।
ऐसा नहीं है कि मेरी खूबसूरती कम हो रही है बल्कि यचह कहा जाए कि मैं अपनी सुंदरता में दिन-प्रतिदिन कुछ ऐसा सौंदर्य बढ़ा रही हूं जो मेरे जीवन के लिए बहुत सुकून भरा होगा लेकिन किसी को इसी सुदरता की फिक्र नहीं। समाज सिर्फ शोहरत और दौलत की अंधी दौड़ में शामिल हो भागता जा रहा है... भागता जा रहा है और मेरा अस्तित्व खत्म करता जा रहा है। आश्चर्य मत कीजिए! इतनी देर से आप सभी जिन्हें जोड़कर समाज बनता है यही सोच रहे होंगे कि आखिर कौन है जो अपनी सुंदरता का इस कदर बयान कर रहा है, जो सबसे अधिक खूबसूरत है पर अंधरों में कैद है, हां मैं कोई और नहीं, बल्कि उस आम इंसान की मेहनता हूं जो एक कोरे कागज पर काली स्याही से अंकित कर दी गई और बन गई इंसान की मेहनत का अफसाना। एक व्यक्ति कितने मेहनत, प्यार और कड़ी लगन से अपने भविष्य को अच्छा बनाने की कोशिश में डिग्रियों पर डिग्रियां लेता रहता है और फिर उन्हीं खूबसूरत डिग्रियों के बल पर अपने अनुभवों और मेहनत का बखान करता है। कुछ समय पूर्व तक इस खूबसूरती के इतने कद्रदान हुआ करते थे जो इस खूबसूरती की तलाश में भटकते रहते थे जबकि आज की ये आधुनिक दुनिया इसे इस हिकारत की नजर से देख रही है जैसे कुछ ही पल लगे हों और यही खूबसूरती पैसों में ढलकर बूढ़ी हो गयी हो, या तो यही खूबसूरती किसी चीज को ढकने का आधार बन जाती है, नहीं तो अलमारियों के अंधेरे में कैद पड़ी यह खूबसूरती उस दिन का इंतजार करतह है जब उसे आजाद कराने को कोई पहल होगी। क्या आज की दुनिया में मेरी खूबसूरती सिर्फ एक कोरे कागज पर काली स्याही से लिखी वह काली किस्मत है जो खुद अपनी खूबसूरती की पहचान को तरसती मेरी इन आंखो से टपकती आंसुओं की धार, मिट्टी मे मिल कहीं खो जाएगी या फिर वह किस्मत जो कोरे कागज को मेरी खूबसूरती से भर एक दिन फिर जवां हो जाएगी और फिर मेरी इन आंखों से बरसात होगी जो मोतियों का रूप धारण कर उच्च स्थान पर बैठेगी।
आखिर कब तक मैं अपनी इस कैद भरी जिंदगी को आजाद कराने के लिए उन्हीं कैदखानों में पड़ी जंग खातह रहूंगी या एक दिन फिर मेरा उदया होगा? बढ़ते जा रहे इस एक-एक लम्हे में बढ़ते और अंकित होती मेरी यह खूबसूरती एक दिन आजाद हो हकीकत के पंख लगा इस समाज को एक नया आयाम देगी। कब तक ये दुनिया मेरी इस खूबसूरती को दौलत-शोहरत से तौल मेरा अपमान करती रहेगी। आप जिसे हम समाज कहते हैं, से मेरी गुज़ारिश है कि आंतरिक सुंदरता की पहचान कर समाज में मुझे फिर से मेरा वही मुकाम लौटा दें, जो मेरा था, मेरा है और मेरा ही रहेगा। बस इस दौलत और शोहरत की बस्ती में मेरी खूबसूरती कुछ समय के लिए खो गई है जिसे फिर से उसी जगह की आशा है जो उसकी थी
मुझ पर यह सितम की इम्तिहा कब तक होगी
मुझे मेरी जगह दे दे मानव
जो मेरी थी, मेरी है और मेरी ही रहेगी
बस तेरे इस दौलत का पर्दा हटने की देर है।

Tuesday, October 25, 2011

साडी दुनिया दीयों के प्रकाश से जगमगा रहा
लेकिन मई किस अँधेरे में हू गुम
दीयों की जगमगाहट से झूम रहा मेरा मन
कितने दिन ये ख़ुशी रहेगी कायम

Monday, January 3, 2011

अतीत


अतीत की सोच में हम इस कदर घिरे हैं
जहाँ आज के रिश्ते सिर्फ ओ सिर्फ बेमानी से लगते हैं
कौन जाने कि वो हँसता- मुस्कुराता अतीत हमें फिर कब नसीब होगा
इसी ख्वाब के लिए हम अपने अतीत में पल -पल जीते - मरते हैं
अब चाह रहे फिर से ख़ुशहाली के वो

पल आयें जहाँ आप और हम थे मुस्कुराए
पर क्या कहें इस ज़माने कि जिसने हमारी इस मुस्कराहट को भी जिम्मेदारियों के बोझ तले बूढ़ा कर दिया
फिर भी उम्मीदों के इस भंवर में जाग रही है जीने की एक नयी राह ...

























Monday, August 23, 2010

राखी



न कोई कड़ी हूँ, न कोई जकड़न,


मैं तो बस वही एक प्यारा सा बंधन हूँ।


मैं राखी हूँ, जिसे किसी ने भेजा है बड़े प्यार से,


एक अटूट रिश्ते के एहसास से।


जो सज जाऊँ कलाई पर तो एक रिश्ते का प्यार जताती हूँ,


खुल भले ही जाऊं पर उस कलाई पर अपने निशाँ छोड़ जाती हूँ।


हाँ मैं वही राखी हूँ, जो भाई की कलाई पर बंध बहन की रक्षार्थ होती हूँ,


हाँ मैं उसी रिश्ते का परिपक्व आधार हूँ।


न कोई कड़ी, न कोई जकड़न,


मैं तो बस एक प्यारा सा बंधन हूँ।

Sunday, August 8, 2010

किस जात-पांत की तू बात करता मानव
किस धर्म का तूने पाठ पढ़ा
इसी अगाधता के भंवर में
तूने ये सारा जंजाल बुना
अभी भी वक्त है संभल जा

मत होने दे नरसंहार यहाँ
कह रही ये फूट-फूट कर रोटी ये धरा
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