Thursday, October 15, 2009

दीपावली की शुभकामनायें

क्यूँ बिजलियों के ढेर लगाये सबने
जब अँधेरा चीरने को एक दिया ही काफी है।

सभी ब्लोगर्स पाठकों को दिवाली की हार्दिक शुभकामनायें।

Thursday, September 10, 2009

अक्स की खोज में

जब भी अपना अक्स ढूँढने निकलती हूँ

ढेरों परछाइयों से घिर जाती हूँ

इन परछाइयों में किसमें मेराअक्स है

यह सोच जिस तरफ भी कदम बढाती हूँ

निराश हो वापस लौट आती हूँ

एक-एक कर हर परछाईं को पराया कर

वापस फिर मझधार में लौट आती हूं

अब इस मझधार में फंसी यही सोच रही

की कब मुझे मेरा किनारा मिलेगा

जिंदगी की इस कड़ी धुप में मुझे मेरे

अक्स की छावं का सहारा मिलेगा

कहीं ऐसा तो नहीं इसी मझधार में डूब अंत को तर जाऊंगी

या फिर किनारा तलाश कर उस तक पहुँच जाऊंगी मैं

Wednesday, May 27, 2009

क्या हैं हम

अक्सर जब हम अकेले होते हैं
ख़ुद से बातें करते हैं, ख़ुद में खोकर यही सोचते हैं
क्या हैं हम और क्यूँ हैं
क्या है हमारी पहचान इस जिंदगी में
लोगों से मिलते हैं, कुछ अच्छाइयां तो कुछ बुराइयां बटोरते है
तब जाकर हम जिंदगी से मिलते हैं
जिंदगी एक पहेली है, जिसे उलझते-सुलझते हम जी जाते हैं
सुलझ गई तो पहचान बनते हैं, वरना इसमे उलझ कर हम ख़ुद सवाल बन जाते हैं
जिंदगी के इस दोराहे का जहाँ अंत है वही हमारा आखिरी पडाव है
जो जान गए उसे माया से विरत होना पड़ा
वरना इसमे ही खोकर ही जीना पड़ा

Sunday, May 24, 2009

दो पल की मेहमाँ है खुशी

दुःखके घर में खुशी, दो पल की मेहमाँ बनकर आई
सब ने लुत्फ़ उठाया, खेले खाए और मज़ा लिया
जब उससे बिछड़ने की ऋतु आई तो फूट-फूट कर रोये सब
दो पल की खुशियाँ देकर चली गई खुशी
फिर आने का वायदा कर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गयी
अब फिर से छा गई उदासी दुःख के घर में ,
बार-बार याद कर उसके आने का इंतज़ार करते हैं सब
इसी इंतज़ार में लम्हा-लम्हा दिन गुजरते हैं सब
कब वो आए,हमारे होठों पर खुशी के फूल खिलाये
ये तो प्रकृति का रिवाज़ है,
ये मेहमाँ तो बस दो पल का आगाज़ है
जिसे आना है और चले जाना है
थोड़े समय के लिए खुशी के फूल खिलाना है
रोते हुए को हँसाना है और फिर धुंधलके में लौट जाना है

Wednesday, May 13, 2009

हमारी हिन्दी

मेरे ख्वाबों की तस्वीर हो तुम

मेरी रातों की नींद हो तुम

तुम्हारी ही गोद में पलकर मै बड़ी हुई

तुम मेरी हो और मै तुम्हारी ही रही

तुम्हारी व्यथा से मै तडपती रही

रात भर तुम्हारी आहों से सिसकती रही

मेरे जज्बातों का एहसास हो तुम

मेरी वीणा के झंकृत तार हो तुम

विदेशों में तुम अपनाई गई

फिर अपनों में क्यों तुम भुलाई गई

क्या तुम्हारी व्यथा का किसी को एहसास नही

क्यों आज तुम्हारी पहचान नही

मेरे संघर्ष का पहला वार हो तुम

फिर क्यों तुम ही संघर्ष करती रहीं

जीवन भर पीड़ा सहती रहीं

क्या हमारा तुम्हारे प्रति कोई दायित्व नहीं

क्यूँ तुम्हे किसी ने पहचाना नहीं