Tuesday, May 22, 2012

मैं और मेरी खूबसूरती

ये उदासी, ये अंधेरा, ये कैद भरी जिंदगी लेकर कहां जाऊं।

मनसा यही जहां जाऊं इसे छोड़ आऊं।।

आज कुछ सोचते-सोचते कितनी उदास हो गई मैं, ये कैद भरी जिंदगी कब अपनी आखिरी सांस लेगी, इसी इंतजार में मेरी खूबसूरती दिन-ब-दिन ढलती जा रही है।
ऐसा नहीं है कि मेरी खूबसूरती कम हो रही है बल्कि यचह कहा जाए कि मैं अपनी सुंदरता में दिन-प्रतिदिन कुछ ऐसा सौंदर्य बढ़ा रही हूं जो मेरे जीवन के लिए बहुत सुकून भरा होगा लेकिन किसी को इसी सुदरता की फिक्र नहीं। समाज सिर्फ शोहरत और दौलत की अंधी दौड़ में शामिल हो भागता जा रहा है... भागता जा रहा है और मेरा अस्तित्व खत्म करता जा रहा है। आश्चर्य मत कीजिए! इतनी देर से आप सभी जिन्हें जोड़कर समाज बनता है यही सोच रहे होंगे कि आखिर कौन है जो अपनी सुंदरता का इस कदर बयान कर रहा है, जो सबसे अधिक खूबसूरत है पर अंधरों में कैद है, हां मैं कोई और नहीं, बल्कि उस आम इंसान की मेहनता हूं जो एक कोरे कागज पर काली स्याही से अंकित कर दी गई और बन गई इंसान की मेहनत का अफसाना। एक व्यक्ति कितने मेहनत, प्यार और कड़ी लगन से अपने भविष्य को अच्छा बनाने की कोशिश में डिग्रियों पर डिग्रियां लेता रहता है और फिर उन्हीं खूबसूरत डिग्रियों के बल पर अपने अनुभवों और मेहनत का बखान करता है। कुछ समय पूर्व तक इस खूबसूरती के इतने कद्रदान हुआ करते थे जो इस खूबसूरती की तलाश में भटकते रहते थे जबकि आज की ये आधुनिक दुनिया इसे इस हिकारत की नजर से देख रही है जैसे कुछ ही पल लगे हों और यही खूबसूरती पैसों में ढलकर बूढ़ी हो गयी हो, या तो यही खूबसूरती किसी चीज को ढकने का आधार बन जाती है, नहीं तो अलमारियों के अंधेरे में कैद पड़ी यह खूबसूरती उस दिन का इंतजार करतह है जब उसे आजाद कराने को कोई पहल होगी। क्या आज की दुनिया में मेरी खूबसूरती सिर्फ एक कोरे कागज पर काली स्याही से लिखी वह काली किस्मत है जो खुद अपनी खूबसूरती की पहचान को तरसती मेरी इन आंखो से टपकती आंसुओं की धार, मिट्टी मे मिल कहीं खो जाएगी या फिर वह किस्मत जो कोरे कागज को मेरी खूबसूरती से भर एक दिन फिर जवां हो जाएगी और फिर मेरी इन आंखों से बरसात होगी जो मोतियों का रूप धारण कर उच्च स्थान पर बैठेगी।
आखिर कब तक मैं अपनी इस कैद भरी जिंदगी को आजाद कराने के लिए उन्हीं कैदखानों में पड़ी जंग खातह रहूंगी या एक दिन फिर मेरा उदया होगा? बढ़ते जा रहे इस एक-एक लम्हे में बढ़ते और अंकित होती मेरी यह खूबसूरती एक दिन आजाद हो हकीकत के पंख लगा इस समाज को एक नया आयाम देगी। कब तक ये दुनिया मेरी इस खूबसूरती को दौलत-शोहरत से तौल मेरा अपमान करती रहेगी। आप जिसे हम समाज कहते हैं, से मेरी गुज़ारिश है कि आंतरिक सुंदरता की पहचान कर समाज में मुझे फिर से मेरा वही मुकाम लौटा दें, जो मेरा था, मेरा है और मेरा ही रहेगा। बस इस दौलत और शोहरत की बस्ती में मेरी खूबसूरती कुछ समय के लिए खो गई है जिसे फिर से उसी जगह की आशा है जो उसकी थी
मुझ पर यह सितम की इम्तिहा कब तक होगी
मुझे मेरी जगह दे दे मानव
जो मेरी थी, मेरी है और मेरी ही रहेगी
बस तेरे इस दौलत का पर्दा हटने की देर है।

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