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राखी

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न कोई कड़ी हूँ, न कोई जकड़न, मैं तो बस वही एक प्यारा सा बंधन हूँ। मैं राखी हूँ, जिसे किसी ने भेजा है बड़े प्यार से, एक अटूट रिश्ते के एहसास से। जो सज जाऊँ कलाई पर तो एक रिश्ते का प्यार जताती हूँ, खुल भले ही जाऊं पर उस कलाई पर अपने निशाँ छोड़ जाती हूँ। हाँ मैं वही राखी हूँ, जो भाई की कलाई पर बंध बहन की रक्षार्थ होती हूँ, हाँ मैं उसी रिश्ते का परिपक्व आधार हूँ। न कोई कड़ी, न कोई जकड़न, मैं तो बस एक प्यारा सा बंधन हूँ।
किस जात - पांत की तू बात करता मानव किस धर्म का तूने पाठ पढ़ा इसी अगाधता के भंवर में तूने ये सारा जंजाल बुना अभी भी वक्त है संभल जा मत होने दे नरसंहार यहाँ कह रही ये फूट - फूट कर रोटी ये धरा .
मैं वक़्त के प्यालों की ख्वाहिश नहीं, जिंदगी मुझसे है मैं जिंदगी से नहीं, यूँ बार-बार मुझ पर शब्दों की आज़माइश न कर, मैं वक़्त का दरिया हूँ, मुझसे उम्मीदों की गुंजाइश न कर

दीपावली की शुभकामनायें

क्यूँ बिजलियों के ढेर लगाये सबने जब अँधेरा चीरने को एक दिया ही काफी है। सभी ब्लोगर्स पाठकों को दिवाली की हार्दिक शुभकामनायें।

अक्स की खोज में

जब भी अपना अक्स ढूँढने निकलती हूँ ढेरों परछाइयों से घिर जाती हूँ इन परछाइयों में किसमें मेराअक्स है यह सोच जिस तरफ भी कदम बढाती हूँ निराश हो वापस लौट आती हूँ एक-एक कर हर परछाईं को पराया कर वापस फिर मझधार में लौट आती हूं अब इस मझधार में फंसी यही सोच रही की कब मुझे मेरा किनारा मिलेगा जिंदगी की इस कड़ी धुप में मुझे मेरे अक्स की छावं का सहारा मिलेगा कहीं ऐसा तो नहीं इसी मझधार में डूब अंत को तर जाऊंगी या फिर किनारा तलाश कर उस तक पहुँच जाऊंगी मैं

क्या हैं हम

अक्सर जब हम अकेले होते हैं ख़ुद से बातें करते हैं, ख़ुद में खोकर यही सोचते हैं क्या हैं हम और क्यूँ हैं क्या है हमारी पहचान इस जिंदगी में लोगों से मिलते हैं, कुछ अच्छाइयां तो कुछ बुराइयां बटोरते है तब जाकर हम जिंदगी से मिलते हैं जिंदगी एक पहेली है, जिसे उलझते-सुलझते हम जी जाते हैं सुलझ गई तो पहचान बनते हैं, वरना इसमे उलझ कर हम ख़ुद सवाल बन जाते हैं जिंदगी के इस दोराहे का जहाँ अंत है वही हमारा आखिरी पडाव है जो जान गए उसे माया से विरत होना पड़ा वरना इसमे ही खोकर ही जीना पड़ा

दो पल की मेहमाँ है खुशी

दुःखके घर में खुशी, दो पल की मेहमाँ बनकर आई सब ने लुत्फ़ उठाया, खेले खाए और मज़ा लिया जब उससे बिछड़ने की ऋतु आई तो फूट-फूट कर रोये सब दो पल की खुशियाँ देकर चली गई खुशी फिर आने का वायदा कर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गयी अब फिर से छा गई उदासी दुःख के घर में , बार-बार याद कर उसके आने का इंतज़ार करते हैं सब इसी इंतज़ार में लम्हा-लम्हा दिन गुजरते हैं सब कब वो आए,हमारे होठों पर खुशी के फूल खिलाये ये तो प्रकृति का रिवाज़ है, ये मेहमाँ तो बस दो पल का आगाज़ है जिसे आना है और चले जाना है थोड़े समय के लिए खुशी के फूल खिलाना है रोते हुए को हँसाना है और फिर धुंधलके में लौट जाना है