साडी दुनिया दीयों के प्रकाश से जगमगा रहा लेकिन मई किस अँधेरे में हू गुम दीयों की जगमगाहट से झूम रहा मेरा मन कितने दिन ये ख़ुशी रहेगी कायम
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अतीत
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अतीत की सोच में हम इस कदर घिरे हैं जहाँ आज के रिश्ते सिर्फ ओ सिर्फ बेमानी से लगते हैं कौन जाने कि वो हँसता- मुस्कुराता अतीत हमें फिर कब नसीब होगा इसी ख्वाब के लिए हम अपने अतीत में पल -पल जीते - मरते हैं अब चाह रहे फिर से ख़ुशहाली के वो पल आयें जहाँ आप और हम थे मुस्कुराए पर क्या कहें इस ज़माने कि जिसने हमारी इस मुस्कराहट को भी जिम्मेदारियों के बोझ तले बूढ़ा कर दिया फिर भी उम्मीदों के इस भंवर में जाग रही है जीने की एक नयी राह ...
राखी
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न कोई कड़ी हूँ, न कोई जकड़न, मैं तो बस वही एक प्यारा सा बंधन हूँ। मैं राखी हूँ, जिसे किसी ने भेजा है बड़े प्यार से, एक अटूट रिश्ते के एहसास से। जो सज जाऊँ कलाई पर तो एक रिश्ते का प्यार जताती हूँ, खुल भले ही जाऊं पर उस कलाई पर अपने निशाँ छोड़ जाती हूँ। हाँ मैं वही राखी हूँ, जो भाई की कलाई पर बंध बहन की रक्षार्थ होती हूँ, हाँ मैं उसी रिश्ते का परिपक्व आधार हूँ। न कोई कड़ी, न कोई जकड़न, मैं तो बस एक प्यारा सा बंधन हूँ।
अक्स की खोज में
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जब भी अपना अक्स ढूँढने निकलती हूँ ढेरों परछाइयों से घिर जाती हूँ इन परछाइयों में किसमें मेराअक्स है यह सोच जिस तरफ भी कदम बढाती हूँ निराश हो वापस लौट आती हूँ एक-एक कर हर परछाईं को पराया कर वापस फिर मझधार में लौट आती हूं अब इस मझधार में फंसी यही सोच रही की कब मुझे मेरा किनारा मिलेगा जिंदगी की इस कड़ी धुप में मुझे मेरे अक्स की छावं का सहारा मिलेगा कहीं ऐसा तो नहीं इसी मझधार में डूब अंत को तर जाऊंगी या फिर किनारा तलाश कर उस तक पहुँच जाऊंगी मैं